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गाज़ियाबाद में जब कोई विवाह बुरी तरह टूटता है, तो मामला शायद ही कभी एक अदालत तक सीमित रहता है। पत्नी क्रूरता की शिकायत, घरेलू हिंसा का आवेदन और भरण-पोषण की याचिका दायर कर सकती है। पति जवाब में तलाक की याचिका दे सकता है। कुछ ही महीनों में वही परिवार तीन-चार न्यायाधीशों के सामने खड़ा होता है। यह पृष्ठ इनमें से हर मुकदमे को और दोनों पक्षों के लिए उसके मायने समझाता है। चैंबर उन महिलाओं की ओर से पेश होता है जिन्हें नुकसान पहुँचा है, और उन परिवारों की ओर से भी जिन पर झूठे आरोप लगे हैं, पर एक ही मामले में कभी दोनों पक्षों की ओर से नहीं।
धारा 85 बीएनएस, यानी पुरानी 498A
विवाहित महिला के प्रति उसके पति या पति के रिश्तेदारों की क्रूरता भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A थी। 1 जुलाई 2024 से दर्ज एफआईआर के लिए यह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 है, और “क्रूरता” की परिभाषा धारा 86 में दी गई है। इसमें ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण शामिल है जिससे महिला आत्महत्या की ओर धकेली जा सकती हो या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य को, शारीरिक या मानसिक, गंभीर क्षति पहुँचने की आशंका हो। इसमें वह उत्पीड़न भी शामिल है जो महिला या उसके परिवार को संपत्ति की किसी गैरकानूनी माँग, आमतौर पर दहेज, पूरी करने के लिए मजबूर करने के इरादे से किया जाए। सज़ा तीन साल तक का कारावास और जुर्माना है। अपराध संज्ञेय और अजमानतीय है।
एक ही एफआईआर में अक्सर जुड़े हुए अपराध भी होते हैं: धारा 80 बीएनएस (पुरानी 304B आईपीसी) के तहत दहेज मृत्यु, दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत अपराध, धारा 316 बीएनएस के तहत स्त्रीधन का आपराधिक न्यासभंग, और चोट पहुँचाना या धमकाना।
उत्तर प्रदेश की प्रतीक्षा अवधि
उत्तर प्रदेश में एक ऐसा चरण है जो देश के अधिकांश हिस्सों में नहीं है। Mukesh Bansal v. State of U.P. (2022) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि 498A की शिकायत के बाद दो महीने तक कोई गिरफ़्तारी या अन्य दबावकारी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। इस अवधि में मामला ज़िले की परिवार कल्याण समिति के पास जाता है, जो दोनों पक्षों से मिलकर अपनी रिपोर्ट देती है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2025 में Shivangi Bansal v. Sahib Bansal में इन दिशा-निर्देशों को मान्यता दी। व्यवहार में गाज़ियाबाद में 498A की शिकायत के लिए इसका मतलब है:
- पुलिस को पति के परिवार को तुरंत गिरफ़्तार करने के बजाय शिकायत परिवार कल्याण समिति को भेजनी चाहिए;
- आपराधिक मामला आगे बढ़ने से पहले दोनों परिवारों को मध्यस्थता का एक व्यवस्थित अवसर मिलता है;
- जहाँ दिखने वाली चोटें हों या अधिक गंभीर अपराध हों, वहाँ यह प्रतीक्षा अवधि लागू नहीं होती।
अगर आप वह महिला हैं
- चिकित्सा सहायता लें और उसका रिकॉर्ड रखें। अगर आपको चोट पहुँची है, तो सरकारी अस्पताल में चिकित्सीय परीक्षण ऐसा साक्ष्य बनाता है जिसे बाद में झुठलाना कठिन होता है।
- अपने स्त्रीधन की सूची रखें। विवाह में मिले गहने, नकदी और सामान लिख लें, और हो सके तो फ़ोटो, बिल और शादी के वीडियो भी रखें। स्त्रीधन आपकी संपत्ति है, पति का परिवार उसे केवल न्यासी के रूप में रखता है।
- वही उपाय चुनें जो आपके काम आएँ। आपराधिक शिकायत सज़ा दिलाती है। घरेलू हिंसा का आवेदन आपको संरक्षण, घर में रहने का अधिकार और पैसा दिलाता है। भरण-पोषण की याचिका मासिक राशि दिलाती है। कई महिलाओं को पहले से ज़्यादा दूसरे और तीसरे उपाय की तुरंत ज़रूरत होती है।
- संदेश सुरक्षित रखें। व्हाट्सऐप या एसएमएस पर आई धमकियाँ, माँगें और गाली-गलौज तारीख़ सहित सहेज लें। गुस्से में चैट न मिटाएँ; स्क्रीनशॉट और फ़ोन, दोनों की ज़रूरत पड़ सकती है।
अगर आपके परिवार का नाम एफआईआर में है
- एफआईआर को ध्यान से पढ़ें। ऐसी एफआईआर को, जिसमें दूसरे शहरों में रहने वाली विवाहित बहनों समेत हर रिश्तेदार का नाम तो है पर किसी के विरुद्ध कोई विशिष्ट कृत्य नहीं लिखा, अदालतें कड़ी नज़र से देखती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दूर के रिश्तेदारों पर लगे ऐसे सर्वव्यापी आरोप निरस्त किए हैं, जैसे Kahkashan Kausar v. State of Bihar (2022) में।
- नोटिस की प्रक्रिया का लाभ लें। अपराध में अधिकतम तीन साल की सज़ा है, इसलिए किसी भी गिरफ़्तारी से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35(3) का नोटिस आना चाहिए। हाज़िर हों और सहयोग करें। अगर गिरफ़्तारी का वास्तविक खतरा है, तो अग्रिम जमानत के लिए जमानत पृष्ठ देखें।
- परिवार कल्याण समिति के सामने उपस्थित हों। न जाना बुरा प्रभाव छोड़ता है और दो महीने बेकार जाते हैं।
- जवाब में झूठा मुकदमा न करें। जब मामला न्यायाधीश के सामने पहुँचता है, तो इससे विश्वसनीयता घटती है।
- निरस्तीकरण। जहाँ आरोप अस्पष्ट हों या पक्षकारों में समझौता हो गया हो, वहाँ इलाहाबाद उच्च न्यायालय धारा 528 बीएनएसएस के तहत मुकदमा निरस्त कर सकता है।
घरेलू हिंसा अधिनियम
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) स्वरूप में दीवानी है, हालाँकि आवेदन मजिस्ट्रेट के सामने दायर होता है। पीड़ित महिला धारा 12 के तहत आवेदन करती है। संरक्षण अधिकारी घरेलू घटना रिपोर्ट तैयार कर सकता है। मजिस्ट्रेट ये आदेश दे सकते हैं:
- हिंसा और संपर्क रोकने वाला संरक्षण आदेश (धारा 18);
- निवास आदेश, ताकि महिला को साझा गृहस्थी से निकाला न जा सके (धारा 19);
- खर्च, इलाज की लागत और छूटी हुई कमाई के लिए आर्थिक राहत (धारा 20);
- बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा (धारा 21);
- चोटों के लिए प्रतिकर, जिसमें मानसिक यातना भी शामिल है (धारा 22)।
धारा 23 के तहत अंतरिम आदेश शुरुआती सुनवाइयों में ही पारित हो सकते हैं। निवास के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय ने Satish Chander Ahuja v. Sneha Ahuja (2020) में माना कि “साझा गृहस्थी” में ससुराल वालों के स्वामित्व वाला वह घर भी शामिल हो सकता है जिसमें दंपति रहते थे। यह S.R. Batra v. Taruna Batra के पहले के मत से अलग था। महिला का अधिकार रहने का है, स्वामित्व का नहीं।
भरण-पोषण
पत्नी, बच्चे या माता-पिता, जो अपना भरण-पोषण स्वयं नहीं कर सकते, ऐसे साधन-संपन्न व्यक्ति से भरण-पोषण माँग सकते हैं जो उनकी उपेक्षा करता है। 1 जुलाई 2024 के बाद दायर याचिकाओं के लिए यह बीएनएसएस की धारा 144 के तहत होता है, जो दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की पुरानी धारा 125 है, और परिवार न्यायालय में दायर होती है। लंबित तलाक के मुकदमे में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च माँगे जा सकते हैं। Rajnesh v. Neha (2020) के अनुसार दोनों पक्षों को एक निर्धारित प्रारूप में अपनी संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करते हुए शपथ पत्र दाखिल करने होते हैं। एक कार्यवाही में दी गई राशि दूसरी कार्यवाहियों में समायोजित की जाती है, ताकि एक ही ज़रूरत का भुगतान दो बार न हो।
कौन से कागज़ लाएँ
- एफआईआर, शिकायत, डीवी आवेदन या भरण-पोषण याचिका, जो भी मौजूद हो।
- शादी का कार्ड, विवाह प्रमाणपत्र या तस्वीरें।
- स्त्रीधन और शादी के खर्च का रिकॉर्ड।
- चिकित्सा के कागज़, पुलिस शिकायतें और परिवार कल्याण समिति के नोटिस।
- भरण-पोषण के लिए आय का प्रमाण: वेतन पर्ची, आईटीआर, बैंक स्टेटमेंट।
अगर विवाह समाप्त हो रहा है, तो तलाक और बच्चों की अभिरक्षा वाला पृष्ठ बताता है कि समझौते की शर्तें इन सभी मुकदमों को एक साथ कैसे समाप्त कर सकती हैं।
लोग अक्सर पूछते हैं
क्या यूपी में 498A के मामले में गिरफ़्तारी से पहले कोई प्रतीक्षा अवधि होती है?
हाँ। Mukesh Bansal v. State of U.P. (2022) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, जिन्हें बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्यता दी, शिकायत के बाद दो महीने तक कोई दबावकारी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए और इस बीच मामला परिवार कल्याण समिति को भेजा जाता है, सिवाय उन मामलों के जिनमें चोटें हों या अधिक गंभीर अपराध हों।
क्या दूसरे शहर में रहने वाली मेरी विवाहित बहन को 498A की एफआईआर पर गिरफ़्तार किया जा सकता है?
ऐसी एफआईआर को, जिसमें हर रिश्तेदार का नाम तो है पर यह नहीं लिखा कि किसने क्या किया, अदालतें बारीकी से देखती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने दूर के रिश्तेदारों पर लगाए गए ऐसे सामान्य आरोप निरस्त किए हैं। साथ ही, किसी भी गिरफ़्तारी से पहले धारा 35(3) का नोटिस ज़रूरी है, क्योंकि इस अपराध में अधिकतम तीन साल की सज़ा है।
क्या किसी महिला को उसके ससुराल के घर से निकाला जा सकता है?
घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत महिला को साझा गृहस्थी में रहने का अधिकार है, और सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि इसमें ससुराल वालों के स्वामित्व वाला वह घर भी शामिल हो सकता है जिसमें दंपति रहते थे। मजिस्ट्रेट इस अधिकार की रक्षा के लिए निवास आदेश पारित कर सकते हैं।
अदालत कितना भरण-पोषण दिलाएगी?
इसका कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है। अदालत दोनों पक्षों की आय, रहन-सहन का स्तर, पत्नी और बच्चों की ज़रूरतें और पति की देनदारियाँ देखती है। Rajnesh v. Neha (2020) के अनुसार दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करते हुए शपथ पत्र दाखिल करने होते हैं।
क्या समझौते के बाद 498A का मुकदमा वापस लिया जा सकता है?
यह अपराध विचारण न्यायालय में शमनीय नहीं है, इसलिए सच्चे समझौते के बाद सामान्य रास्ता भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय में निरस्तीकरण याचिका का है, जो अक्सर आपसी सहमति से तलाक के साथ संयुक्त रूप से दायर की जाती है।
घरेलू हिंसा अधिनियम से ऐसा क्या मिल सकता है जो पुलिस केस से नहीं मिलता?
संरक्षण आदेश, घर में रहने का अधिकार, मासिक राशि, बच्चों की अस्थायी अभिरक्षा और प्रतिकर। ये दीवानी राहतें हैं, और अंतरिम आदेश शुरुआती सुनवाइयों में ही आ सकते हैं।
यह कानून की सामान्य जानकारी है, आपके मामले की सलाह नहीं। तथ्य बदलने से नतीजे बदल जाते हैं, इसलिए अपने मामले के बारे में किसी अधिवक्ता से बात करें।