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लगभग हर आपराधिक मुकदमे में पहली लड़ाई जमानत की होती है, और परिवार को सबसे ज़्यादा फ़िक्र इसी की रहती है। आप किस अदालत में जाते हैं, किस क्रम में जाते हैं और अर्जी के साथ क्या-क्या दाखिल करते हैं, इन्हीं बातों से तय होता है कि कोई व्यक्ति कितनी जल्दी घर लौटेगा। इस पृष्ठ में बताया गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत गाज़ियाबाद की अदालतों में जमानत की प्रक्रिया कैसे चलती है। यह संहिता 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर एफआईआर पर लागू होती है।
जमानती और गैर-जमानती अपराध
बीएनएसएस की पहली अनुसूची हर अपराध को जमानती या गैर-जमानती के रूप में चिह्नित करती है। यही एक शब्द आगे की लगभग हर बात तय कर देता है।
- जमानती अपराध। जमानत एक अधिकार है। पुलिस अधिकारी या अदालत को उस व्यक्ति को जमानतदारों सहित या उनके बिना जमानत बंधपत्र पर रिहा करना ही होता है (धारा 478 बीएनएसएस)। यदि व्यक्ति गिरफ्तारी के एक सप्ताह के भीतर जमानत नहीं दे पाता, तो अदालत को उसे निर्धन मानकर निजी मुचलके पर रिहा करना चाहिए।
- गैर-जमानती अपराध। जमानत अदालत के विवेक पर निर्भर है। अर्जी में यह दिखाना होता है कि रिहाई सुरक्षित क्यों है: आरोप की प्रकृति, साक्ष्य, व्यक्ति के फ़रार होने या गवाहों को प्रभावित करने का जोखिम, और उसका पिछला रिकॉर्ड।
गाज़ियाबाद में अदालतों का क्रम
- आरडीसी में मजिस्ट्रेट। गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, आमतौर पर उसी अदालत में जो संबंधित थाने के मुकदमे देखती है। पहली नियमित जमानत अर्जी सामान्यतः यहीं धारा 480 बीएनएसएस के तहत दी जाती है। मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों में मजिस्ट्रेट की जमानत देने की शक्ति बहुत सीमित है, सिवाय महिलाओं, सोलह वर्ष से कम आयु के बच्चों और बीमार या अशक्त व्यक्तियों के।
- सत्र न्यायालय, गाज़ियाबाद। यदि मजिस्ट्रेट जमानत नामंज़ूर कर दें, या अपराध ऐसा हो जिसमें मजिस्ट्रेट जमानत नहीं दे सकते, तो अर्जी धारा 483 बीएनएसएस के तहत सत्र न्यायालय में जाती है। गाज़ियाबाद में सत्र न्यायालय की जमानत अर्जियाँ आमतौर पर कुछ दिनों में सूचीबद्ध हो जाती हैं। अदालत पहले केस डायरी और अभियोजन का जवाब तलब करती है।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय। यदि सत्र न्यायालय जमानत नामंज़ूर कर दे, तो अगली अर्जी उसी धारा 483 के तहत उच्च न्यायालय में दी जाती है। उच्च न्यायालय की जमानत अर्जी के लिए सत्र न्यायालय के आदेश और मुख्य दस्तावेज़ों की प्रमाणित प्रतियाँ चाहिए। इन प्रतियों को जुटाने में समय लगता है, इसलिए जिस दिन सत्र न्यायालय का आदेश आए, उसी दिन इनके लिए आवेदन कर देना चाहिए।
एक ही अदालत में दूसरी जमानत अर्जी में परिस्थितियों में वास्तविक बदलाव दिखाना होता है, जैसे आरोप पत्र दाखिल हो जाना, किसी सह-अभियुक्त को जमानत मिल जाना या लंबी हिरासत। वही पुराने आधार दोहराने से एक सुनवाई बेकार चली जाती है।
अग्रिम जमानत
यदि आपके पास यह मानने का कारण है कि किसी गैर-जमानती अपराध में आपकी गिरफ्तारी हो सकती है, तो आप धारा 482 बीएनएसएस के तहत, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 438 थी, अग्रिम जमानत की अर्जी दे सकते हैं। गाज़ियाबाद में यह अर्जी आमतौर पर पहले सत्र न्यायालय में दी जाती है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पास भी यही शक्ति है और उपयुक्त मामलों में वह ऐसी अर्जियाँ सीधे सुनता है।
थोड़ा इतिहास जानने से समझ आता है कि उत्तर प्रदेश में बहुत से लोग इस उपाय को लेकर असमंजस में क्यों रहते हैं। उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत 1976 से 2019 तक उपलब्ध नहीं थी, जब सीआरपीसी में राज्य संशोधन से इसे बहाल किया गया। 1 जुलाई 2024 से यह बीएनएसएस के तहत उपलब्ध है, वैसे ही जैसे भारत में हर जगह।
अदालत क्या देखती है:
- आरोप की प्रकृति और गंभीरता, और एफआईआर में आपके विरुद्ध वास्तव में क्या लिखा है;
- आपका कोई आपराधिक रिकॉर्ड है या नहीं;
- आपके फ़रार होने या साक्ष्य से छेड़छाड़ करने की संभावना है या नहीं;
- आरोप आपको अपमानित करने या दबाव में लाने के इरादे से लगाया गया लगता है या नहीं, जो पारिवारिक और लेन-देन के विवादों में आम है।
अदालत पहली ही तारीख पर अंतरिम संरक्षण दे सकती है और साथ में पुलिस रिपोर्ट तलब कर सकती है, और धारा 482(2) के तहत शर्तें लगा सकती है: बुलाए जाने पर जाँच में शामिल होना, बिना अनुमति भारत से बाहर न जाना और गवाहों से संपर्क न करना। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 65 और 70(2) के तहत अठारह वर्ष से कम आयु की लड़की से बलात्कार के आरोप में अग्रिम जमानत उपलब्ध नहीं है।
आरोप पत्र देर से आने पर डिफ़ॉल्ट जमानत
यदि पुलिस कानून द्वारा तय समय के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं करती, तो हिरासत में बंद व्यक्ति को धारा 187(3) बीएनएसएस के तहत जमानत का पूर्ण अधिकार मिल जाता है। समय-सीमा यह है:
- 90 दिन मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस वर्ष अथवा उससे अधिक कारावास से दंडनीय अपराधों में;
- 60 दिन बाकी हर अपराध में।
इस अधिकार का दावा करना पड़ता है। अर्जी अवधि पूरी होने के बाद और आरोप पत्र आने से पहले दाखिल करनी होती है। आरोप पत्र दाखिल होते ही यह अधिकार समाप्त हो जाता है, इसलिए पहले रिमांड से दिन गिनिए और पुलिस का इंतज़ार मत कीजिए।
विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत
धारा 479 बीएनएसएस उन लोगों के लिए एक संरक्षण जोड़ती है जिन्होंने मुकदमे के दौरान लंबा समय जेल में बिताया है। जिसने उस अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा हिस्सा काट लिया हो, उसे बंधपत्र पर रिहा किया जाना आवश्यक है। पहली बार के अपराधी को एक-तिहाई के बाद रिहा किया जाना आवश्यक है। यह मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों पर लागू नहीं होता। जेल अधीक्षक का दायित्व है कि वह अदालत में अर्जी दे, लेकिन व्यवहार में परिवार को इस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और अपनी ओर से अर्जी दाखिल करवानी चाहिए।
पहले दिन क्या-क्या इंतज़ाम करें
- जमानतदार। आमतौर पर दो, और हर एक के पास आधार कार्ड या अन्य पहचान पत्र और संपत्ति या आय का प्रमाण, जैसे खतौनी, रजिस्ट्री की प्रति, वाहन की आरसी या वेतन पर्ची। अदालत जमानतदारों के कागज़ात के सत्यापन का आदेश दे सकती है, और तहसील या पुलिस के ज़रिये सत्यापन में कई दिन लगते हैं। कागज़ात अर्जी तैयार होते समय ही जुटा लें, जमानत मिलने के बाद नहीं।
- अर्जी के लिए दस्तावेज़। एफआईआर, रिमांड आदेश, यदि स्वास्थ्य को आधार बनाया जा रहा हो तो चिकित्सा संबंधी कागज़ात, और स्थायी पते तथा नौकरी का प्रमाण।
- प्रतियाँ। सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय की अर्जी के लिए पहले के जमानत आदेश की प्रमाणित प्रतियाँ चाहिए। इनके लिए तुरंत आवेदन करें।
जमानत मिलने के बाद
अदालत शर्तें तय करती है, जैसे हर तारीख पर हाज़िर होना या बिना अनुमति ज़िले अथवा देश से बाहर न जाना। इन्हें तोड़ना जमानत रद्द होने की सबसे आम वजह है। अगर मुकदमा वर्षों चलने वाला है, तो तारीखों की एक डायरी रखें। एक तारीख चूकने से गैर-जमानती वारंट जारी हो सकता है और अदालत का एक नया चक्कर शुरू हो सकता है।
आपराधिक मुकदमे का बाकी हिस्सा कैसे चलता है, इसके लिए गाज़ियाबाद में आपराधिक अधिवक्ता वाला पृष्ठ देखें। दहेज या 498ए के मामले में जमानत के लिए 498ए और घरेलू हिंसा वाला पृष्ठ देखें।
लोग अक्सर पूछते हैं
गाज़ियाबाद में जमानत अर्जी पर सुनवाई कितनी जल्दी हो सकती है?
मजिस्ट्रेट आमतौर पर पेशी के समय या एक-दो दिन के भीतर जमानत पर सुनवाई करते हैं। सत्र न्यायालय में जमानत अर्जियाँ केस डायरी तलब होने के बाद प्रायः कुछ दिनों में सूचीबद्ध हो जाती हैं। उच्च न्यायालय में जमानत में अधिक समय लगता है, क्योंकि निचली अदालत के आदेशों की प्रमाणित प्रतियाँ चाहिए होती हैं।
क्या एफआईआर दर्ज होने से पहले अग्रिम जमानत की अर्जी दी जा सकती है?
हाँ, बशर्ते आप किसी गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तारी की वास्तविक और युक्तिसंगत आशंका दिखा सकें, जैसे आपके विरुद्ध पहले से दी गई कोई शिकायत या मुकदमे की कोई स्पष्ट धमकी। केवल अस्पष्ट चिंता पर्याप्त नहीं है।
क्या उत्तर प्रदेश में अग्रिम जमानत मिलती है?
हाँ। उत्तर प्रदेश में 1976 से 2019 तक यह उपलब्ध नहीं थी, इसी कारण बहुत से लोग आज भी मानते हैं कि यहाँ अग्रिम जमानत नहीं होती। 2019 से यह उपलब्ध है और 1 जुलाई 2024 से यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 482 के अंतर्गत है।
डिफ़ॉल्ट जमानत क्या है?
यदि पुलिस 60 दिन के भीतर, या मृत्युदंड, आजीवन कारावास अथवा दस वर्ष या उससे अधिक कारावास से दंडनीय अपराधों में 90 दिन के भीतर, आरोप पत्र दाखिल नहीं करती, तो हिरासत में बंद व्यक्ति भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 187(3) के तहत जमानत का हकदार हो जाता है। यह अर्जी आरोप पत्र दाखिल होने से पहले देनी होती है।
जमानतदार कौन बन सकता है?
आमतौर पर कोई रिश्तेदार या परिचित, जिसके पास पहचान पत्र और इलाके में संपत्ति या नियमित आय का प्रमाण हो, जैसे खतौनी, रजिस्ट्री की प्रति, वाहन की आरसी या वेतन पर्ची। गाज़ियाबाद की अदालतें प्रायः दो जमानतदार माँगती हैं और उनके कागज़ात के सत्यापन का आदेश दे सकती हैं।
क्या जमानत बाद में रद्द हो सकती है?
हाँ, यदि अभियुक्त शर्तें तोड़े, गवाहों को धमकाए, साक्ष्य से छेड़छाड़ करे या कोई और अपराध करे। अदालत की तारीखों पर हाज़िर न होना वह सबसे आम वजह है जिससे परिवार दोबारा अदालत के चक्कर में पड़ जाते हैं।
यह कानून की सामान्य जानकारी है, आपके मामले की सलाह नहीं। तथ्य बदलने से नतीजे बदल जाते हैं, इसलिए अपने मामले के बारे में किसी अधिवक्ता से बात करें।