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ज़्यादातर लोग आपराधिक मामलों के अधिवक्ता से पहली बार अपने साल के सबसे बुरे दिन मिलते हैं: थाने से फ़ोन आया है, गेट पर नोटिस चिपका मिला है, या घर का कोई सदस्य रात को लौटा नहीं है। इस पेज पर बताया गया है कि गाज़ियाबाद की अदालतों में आपराधिक मुकदमा असल में कैसे चलता है, ताकि पहली सुनवाई से पहले ही आपको पता हो कि आप कहाँ खड़े हैं।
नीचे की पूरी जानकारी नए आपराधिक कानूनों के अनुसार है। 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज मामले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) के तहत चलते हैं। पुराने मामले दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और साक्ष्य अधिनियम के तहत ही चलते रहते हैं। पेज के अंत के पास दी गई तालिका में आम धाराओं का पुराना-नया मिलान है।
आपराधिक मुकदमा शुरू कैसे होता है
आम तौर पर तीन रास्ते हैं:
- थाने में एफआईआर। संज्ञेय अपराध में पुलिस को बीएनएसएस की धारा 173 के तहत प्राथमिकी यानी एफआईआर दर्ज करनी ही होती है। उसकी एक प्रति मुफ़्त पाना आपका अधिकार है। उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर एफआईआर एक-दो दिन के भीतर यूपी पुलिस के सिटीज़न पोर्टल या यूपीकॉप ऐप से डाउनलोड की जा सकती हैं। यौन अपराधों और कुछ संवेदनशील श्रेणियों की एफआईआर ऑनलाइन नहीं डाली जातीं।
- मजिस्ट्रेट के सामने परिवाद। पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना कर दे तो पीड़ित व्यक्ति पहले पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत दे सकता है और फिर बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट से एफआईआर दर्ज कर विवेचना कराने के आदेश की अर्ज़ी दे सकता है। बीएनएसएस की धारा 223 के तहत सीधे निजी परिवाद भी दायर किया जा सकता है, जिसमें मजिस्ट्रेट बयान दर्ज करके तय करते हैं कि अभियुक्त को तलब किया जाए या नहीं।
- अदालत से समन। कई बार मुकदमे की पहली खबर ही तब मिलती है जब आरोप पत्र दाखिल हो चुका होता है, अदालत संज्ञान ले चुकी होती है और समन घर पहुँचता है।
अगर पुलिस ने आपको बुलाया है
धारा 35(3) का नोटिस गिरफ्तारी नहीं है
सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आम तौर पर सीधे गिरफ्तार करने के बजाय बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत हाज़िर होने का लिखित नोटिस भेजना होता है। यही नियम सर्वोच्च न्यायालय ने Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) में तय किया था, जो अब बीएनएसएस में लिख दिया गया है। अगर आप नोटिस का पालन करते हैं और सहयोग करते रहते हैं, तो गिरफ्तारी से पहले पुलिस को कारण दर्ज करने होंगे।
दी गई तारीख पर ज़रूर जाएँ। नोटिस की फोटोकॉपी रखें, लिख लें कि किस अधिकारी से कितने बजे मिले, और हाज़िरी का सबूत संभालकर रखें। फ़ोन पर “पूछताछ के लिए आ जाओ” कहना नोटिस नहीं है। उसे लिखित में माँगें।
थाने में आपके अधिकार
- जिन सवालों के जवाब से आप खुद फँस सकते हैं, उनका जवाब देने से आप मना कर सकते हैं (संविधान का अनुच्छेद 20(3))।
- पूछताछ के दौरान आप अपने अधिवक्ता से मिल सकते हैं, हालाँकि पूरी पूछताछ भर नहीं (बीएनएसएस की धारा 38)।
- गिरफ्तारी होने पर आपको गिरफ्तारी के आधार बताने होंगे और यह भी कि अपराध जमानती है या नहीं, और पुलिस को आपके बताए किसी रिश्तेदार या मित्र को सूचना देनी होगी (बीएनएसएस की धाराएँ 47 और 48)।
- गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर, यात्रा का समय छोड़कर, आपको मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है (बीएनएसएस की धारा 58)।
- किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, सिवाय असाधारण परिस्थितियों के, और तब भी महिला अधिकारी की मौजूदगी और मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति ज़रूरी है (बीएनएसएस की धारा 43(5))।
गाज़ियाबाद में आपका मुकदमा किस अदालत में चलेगा
गाज़ियाबाद जिले की सभी आपराधिक अदालतें राज नगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर (आरडीसी) के न्यायालय परिसर में बैठती हैं। रिमांड, ज़्यादातर मामलों में जमानत, और सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों का विचारण मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने होता है। हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, डकैती और दहेज हत्या जैसे सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध सत्र न्यायालय, गाज़ियाबाद को सुपुर्द कर दिए जाते हैं। पॉक्सो, एनडीपीएस, एससी/एसटी एक्ट और कुछ अन्य अपराधों की विशेष अदालतें इसी परिसर में बैठती हैं।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के थानों के मामले गौतमबुद्ध नगर जिले के हैं और सूरजपुर की अदालतों में जाते हैं, गाज़ियाबाद नहीं। दोनों जिले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधीन आते हैं।
आरोप पत्र से फैसले तक
- आरोप पत्र और संज्ञान। विवेचना पूरी होने पर पुलिस बीएनएसएस की धारा 193 के तहत रिपोर्ट दाखिल करती है। अदालत संज्ञान लेकर समन या वारंट जारी करती है।
- हाज़िरी और जमानत। अगर विवेचना के दौरान आपकी गिरफ्तारी नहीं हुई और आपने सहयोग किया, तो अदालत को सामान्यतः समन जारी करके, आपको पहले हिरासत में भेजे बिना, जमानत पर फैसला करना चाहिए। यही सर्वोच्च न्यायालय का Satender Kumar Antil v. CBI (2022) में दिया गया निर्देश है।
- पुलिस कागज़ात की प्रतियाँ। आपको आरोप पत्र, एफआईआर, गवाहों के बयान और वे दस्तावेज़ मिलते हैं जिन पर अभियोजन भरोसा करता है (बीएनएसएस की धारा 230)।
- उन्मोचन या आरोप। आरोप तय होने से पहले बचाव पक्ष डिस्चार्ज यानी उन्मोचन की माँग कर सकता है, अगर कागज़ात से कोई मामला बनता ही नहीं: सत्र मामलों में बीएनएसएस की धारा 250, मजिस्ट्रेट के वारंट मामलों में धारा 262। ठीक से बहस किया गया उन्मोचन प्रार्थना पत्र कमज़ोर मामले को इसी चरण पर खत्म कर सकता है।
- अभियोजन साक्ष्य। गवाहों के बयान होते हैं और उनकी जिरह की जाती है। यह सबसे लंबा चरण है, और ज़्यादातर मुकदमे यहीं जीते या हारे जाते हैं।
- अभियुक्त का बयान बीएनएसएस की धारा 351 के तहत, फिर बचाव पक्ष का साक्ष्य अगर कोई हो, अंतिम बहस और फैसला।
मजिस्ट्रेट की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील सत्र न्यायालय में होती है। सत्र न्यायालय की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील इलाहाबाद उच्च न्यायालय में होती है।
एफआईआर रद्द कराना
इलाहाबाद उच्च न्यायालय बीएनएसएस की धारा 528 (पुरानी सीआरपीसी की धारा 482) के तहत एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही रद्द कर सकता है। इसके लिए वह State of Haryana v. Bhajan Lal (1992) में तय श्रेणियों पर चलता है, जिनमें शामिल हैं:
- ऐसी एफआईआर जिसकी हर बात सच मान लेने पर भी कोई अपराध नहीं बनता;
- ऐसे आरोप जो इतने बेतुके या असंभव हों कि कोई भी समझदार व्यक्ति उन पर यकीन न करे;
- ऐसा मुकदमा जो किसी छिपे मकसद से, निजी रंजिश निकालने के लिए दर्ज कराया गया हो।
जो विवाद असल में दीवानी हैं, जैसे न चुकाया गया कर्ज़ या बिगड़ा हुआ कारोबारी सौदा जिसे धोखाधड़ी बनाकर लिखा गया हो, वे रद्द कराने का आम आधार हैं। वैवाहिक और व्यावसायिक मामले, जिनमें पक्षकारों ने सचमुच समझौता कर लिया हो, Gian Singh v. State of Punjab (2012) के तहत समझौते के आधार पर रद्द किए जा सकते हैं। हत्या या बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में यह रास्ता खुला नहीं है। उत्तर प्रदेश में बहुत से लोग उच्च न्यायालय में रिट याचिका भी दायर करते हैं, जिसमें एफआईआर रद्द करने और विवेचना के दौरान गिरफ्तारी से संरक्षण की माँग की जाती है।
पुराना कानून या नया कानून
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज एफआईआर अपनी पूरी उम्र आईपीसी और सीआरपीसी के तहत ही चलती है (बीएनएसएस की धारा 531)। धाराओं के नंबर बदल गए हैं, इसीलिए अपनी एफआईआर पढ़ने वाले लोग अक्सर उसे ऑनलाइन मिली जानकारी से मिला नहीं पाते।
| विषय | पुरानी (आईपीसी / सीआरपीसी) | नई (बीएनएस / बीएनएसएस) |
|---|---|---|
| धोखाधड़ी | 420 आईपीसी | 318(4) बीएनएस |
| आपराधिक न्यासभंग | 406 आईपीसी | 316(2) बीएनएस |
| विवाहित महिला के साथ क्रूरता | 498A आईपीसी | 85 बीएनएस |
| स्वेच्छा से चोट पहुँचाना | 323 आईपीसी | 115(2) बीएनएस |
| आपराधिक धमकी | 506 आईपीसी | 351(2) और 351(3) बीएनएस |
| हत्या का प्रयास | 307 आईपीसी | 109 बीएनएस |
| अग्रिम जमानत | 438 सीआरपीसी | 482 बीएनएसएस |
| उच्च न्यायालय द्वारा रद्द करना | 482 सीआरपीसी | 528 बीएनएसएस |
| गिरफ्तारी के बजाय नोटिस | 41A सीआरपीसी | 35(3) बीएनएसएस |
चैंबर में क्या लेकर आएँ
- एफआईआर, पुलिस का नोटिस या अदालत का समन, जो भी आपके पास हो।
- आपके खिलाफ दायर कोई शिकायत या प्रार्थना पत्र, और जो कुछ आपने खुद दाखिल किया हो।
- आपका पहचान पत्र, और एफआईआर में नामित परिवार के सदस्यों के पहचान पत्र।
- तारीखों के साथ घटनाओं का छोटा लिखित क्रम, जब तक तारीखें याद हैं तभी लिख लें।
- जहाँ पैसे का मामला हो: बैंक स्टेटमेंट, रसीदें, अनुबंध, और लेन-देन से जुड़ी चैट या ईमेल।
चैंबर जो आपराधिक काम लेता है
अधिवक्ता विशु कुशवाहा जमानत और अग्रिम जमानत के मामलों, आरडीसी की मजिस्ट्रेट और सत्र अदालतों में आपराधिक विचारण, चेक बाउंस परिवाद, 498A, दहेज और घरेलू हिंसा के मामले, धोखाधड़ी और न्यासभंग के मामले, साइबर ठगी की शिकायतें, और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रद्दकरण याचिकाएँ, आपराधिक अपील और पुनरीक्षण में पैरवी करते हैं।
लोग अक्सर पूछते हैं
पुलिस ने मुझे थाने बुलाया है। क्या मुझे जाना चाहिए?
अगर आपको भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 35(3) के तहत लिखित नोटिस मिला है, तो हाँ। तय तारीख पर जाएँ, नोटिस की प्रति अपने पास रखें, और इस बात का सबूत रखें कि आप गए थे। अगर सिर्फ फ़ोन आया है, तो लिखित नोटिस माँगें और जाने से पहले किसी अधिवक्ता से बात करें।
क्या मुझे अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर की प्रति मिल सकती है?
हाँ। उत्तर प्रदेश में ज़्यादातर एफआईआर एक-दो दिन के भीतर यूपी पुलिस के सिटीज़न पोर्टल और यूपीकॉप ऐप पर अपलोड हो जाती हैं। अगर वह ऑनलाइन नहीं है, जैसे यौन अपराधों में, तो प्रति अदालत के माध्यम से ली जा सकती है।
विवेचना के दौरान मेरी गिरफ्तारी नहीं हुई। क्या आरोप पत्र दाखिल होने पर मुझे जेल जाना पड़ेगा?
आम तौर पर नहीं। Satender Kumar Antil v. CBI (2022) के अनुसार, जहाँ अभियुक्त की विवेचना के दौरान गिरफ्तारी नहीं हुई और उसने सहयोग किया, वहाँ अदालत को सामान्यतः समन जारी करके, अभियुक्त को पहले हिरासत में भेजे बिना, जमानत पर फैसला करना चाहिए।
क्या झूठी एफआईआर रद्द हो सकती है?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत एफआईआर रद्द कर सकता है, अगर उसे जस का तस मान लेने पर भी कोई अपराध नहीं बनता, अगर आरोप अपने आप में असंभव लगते हैं, या अगर मुकदमा साफ तौर पर रंजिश निकालने के लिए दर्ज कराया गया है। जिन मामलों में पक्षकारों ने समझौता कर लिया है, वे भी समझौते के आधार पर रद्द हो सकते हैं, गंभीर अपराधों को छोड़कर।
गाज़ियाबाद में आपराधिक मुकदमे में कितना समय लगता है?
सत्र विचारण में आम तौर पर कई साल लगते हैं, क्योंकि अदालत का कार्यभार भारी है और गवाह हर तारीख पर हाज़िर नहीं होते। छोटे मामलों में मजिस्ट्रेट के विचारण जल्दी पूरे हो सकते हैं। कोई भी ईमानदारी से तारीख का वादा नहीं कर सकता।
मेरी एफआईआर में धारा 420 लिखी है, पर ऑनलाइन मैंने धारा 318 पढ़ी। कौन सी सही है?
तारीख के हिसाब से दोनों। 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज एफआईआर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत ही रहती है, इसलिए उसके लिए 420 सही है। उस तारीख को या उसके बाद दर्ज एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होती है, जिसमें धोखाधड़ी की धारा 318(4) है।
यह कानून की सामान्य जानकारी है, आपके मामले की सलाह नहीं। तथ्य बदलने से नतीजे बदल जाते हैं, इसलिए अपने मामले के बारे में किसी अधिवक्ता से बात करें।