इस पृष्ठ पर
गाज़ियाबाद जिले के तलाक, भरण-पोषण और अभिरक्षा के मुकदमे परिवार न्यायालय, गाज़ियाबाद में सुने जाते हैं। इस पृष्ठ में बताया गया है कि हिंदू विवाह किन दो रास्तों से भंग होता है, आपसी सहमति से और विवादित तरीके से, समझौते में क्या-क्या शामिल होता है, और अदालत यह कैसे तय करती है कि बच्चे किसके पास रहेंगे। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (एचएमए) के अधीन आते हैं। विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत पंजीकृत विवाह, जिनमें अधिकांश अंतर-धार्मिक विवाह शामिल हैं, उसी अधिनियम के अनुसार चलते हैं, और मुस्लिम तथा ईसाई विवाहों के अपने अलग कानून हैं। प्रक्रिया लगभग एक जैसी है, और जहाँ अंतर मायने रखता है, वहाँ उसका उल्लेख किया गया है।
क्या मुकदमा गाज़ियाबाद में दायर हो सकता है?
एचएमए की धारा 19 के अनुसार तलाक की याचिका वहाँ दायर की जा सकती है जहाँ:
- विवाह संपन्न हुआ था;
- याचिका दायर करते समय दूसरा पक्ष रह रहा है;
- पति-पत्नी अंतिम बार साथ रहे थे; या
- पत्नी रहती है, यदि याचिका वही दायर कर रही है।
इसलिए जिस दंपति का विवाह दिल्ली में हुआ और जो अंतिम बार इंदिरापुरम में साथ रहे, वे गाज़ियाबाद में मुकदमा दायर कर सकते हैं। जो पत्नी गाज़ियाबाद में अपने मायके लौट आई है, वह भी यहीं दायर कर सकती है।
आपसी सहमति से तलाक (धारा 13B)
यह सबसे तेज़ और सबसे कम कड़वाहट वाला रास्ता है, और समझौते से निपटने वाले ज़्यादातर मामले इसी तरह समाप्त होते हैं। इसकी शर्तें:
- पति और पत्नी याचिका दायर करने से पहले कम से कम एक साल से अलग रह रहे हों। अलग रहने का मतलब है पति-पत्नी के रूप में न रहना, भले ही एक ही छत के नीचे रह रहे हों;
- वे साथ रह पाने में असमर्थ रहे हों; और
- वे इस पर सहमत हों कि विवाह भंग होना चाहिए, और शर्तों पर भी सहमत हों।
दो प्रस्ताव
- पहला प्रस्ताव। समझौते की शर्तों के साथ परिवार न्यायालय में संयुक्त याचिका दायर की जाती है, और दोनों पक्ष हाज़िर होकर बयान देते हैं। पहचान पत्र, विवाह प्रमाणपत्र या विवाह का प्रमाण, फ़ोटो और पते का प्रमाण साथ लाएँ।
- प्रतीक्षा अवधि। कानून के अनुसार दूसरे प्रस्ताव से पहले कम से कम 6 महीने का अंतराल ज़रूरी है। इसका उद्देश्य सुलह का एक आखिरी मौका देना है।
- दूसरा प्रस्ताव। पहले प्रस्ताव के 6 से 18 महीने के भीतर दोनों पक्ष फिर हाज़िर होते हैं और अपनी सहमति की पुष्टि करते हैं। इसके बाद अदालत तलाक की डिक्री पारित करती है।
6 महीने की अवधि में छूट
सर्वोच्च न्यायालय ने Amardeep Singh v. Harveen Kaur (2017) में कहा कि 6 महीने की यह अवधि निर्देशात्मक है, अनिवार्य नहीं। परिवार न्यायालय इसमें छूट दे सकता है यदि:
- पहले प्रस्ताव के समय तक एक साल का अलगाव और उसके ऊपर 6 महीने की अवधि पहले ही बीत चुकी हो;
- मध्यस्थता और सुलह के प्रयास विफल हो चुके हों और साथ रहने की कोई संभावना न हो;
- पक्षकारों ने गुज़ारा भत्ता और अभिरक्षा समेत अपने सभी मतभेद वास्तव में सुलझा लिए हों; और
- प्रतीक्षा से उनकी पीड़ा केवल लंबी खिंचेगी।
छूट का आवेदन पहले प्रस्ताव के बाद दिया जाता है। उसे मंज़ूर करना या न करना अदालत के विवेक पर है। जो कोई 30 दिन में तलाक का पक्का वादा करता है, वह उस बात का वादा कर रहा है जो अदालत ने अभी तय ही नहीं की।
समझौते में क्या-क्या शामिल होता है
जिस समझौते में कोई बात छूट जाती है, वह नए मुकदमे के रूप में लौट आती है। पूरा समझौता इन सब को समेटता है:
- स्थायी गुज़ारा भत्ता। एकमुश्त राशि या किस्तें, तारीखों सहित। आखिरी किस्त का भुगतान दूसरे प्रस्ताव के समय करने से दोनों पक्ष सुरक्षित रहते हैं।
- स्त्रीधन। लौटाए गए गहनों और सामान की सूची, रसीद के साथ।
- बच्चे। अभिरक्षा, मुलाक़ात के दिन और छुट्टियाँ, स्कूल और इलाज से जुड़े फ़ैसले, और बच्चों का भरण-पोषण, जो गुज़ारा भत्ते से अलग होता है।
- संपत्ति। संयुक्त स्वामित्व वाले फ़्लैट, होम लोन और संयुक्त खाते।
- लंबित मुकदमे। भरण-पोषण, घरेलू हिंसा और तलाक के मुकदमों की वापसी, और 498A या दहेज की एफआईआर रद्द कराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में संयुक्त आवेदन। 498A और घरेलू हिंसा वाला पृष्ठ इन मुकदमों को समझाता है।
विवादित तलाक (धारा 13)
जब एक पक्ष सहमत नहीं होता, तो दूसरे को अदालत में कोई आधार साबित करना पड़ता है। एचएमए की धारा 13 के तहत आधारों में शामिल हैं:
- क्रूरता, शारीरिक या मानसिक, जो सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला आधार है;
- लगातार कम से कम 2 साल तक परित्याग;
- व्यभिचार;
- दूसरे धर्म में धर्मांतरण;
- गंभीर मानसिक विकार, संक्रामक यौन रोग, संसार का त्याग, या 7 साल से कोई खबर न होना।
तलाक वहाँ भी माँगा जा सकता है जहाँ न्यायिक पृथक्करण या दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की डिक्री का एक साल तक पालन न हुआ हो। विवाह का असाध्य रूप से टूट जाना ऐसा आधार नहीं है जिस पर परिवार न्यायालय तलाक दे सके। केवल सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 142 के तहत इस आधार पर विवाह भंग कर सकता है, जैसा कि संविधान पीठ ने Shilpa Sailesh v. Varun Sreenivasan (2023) में कहा।
विवादित मुकदमा अभिवचन, अनिवार्य मध्यस्थता, साक्ष्य और बहस के चरणों से गुज़रता है, और अक्सर कुछ साल लेता है। बहुत से विवादित मुकदमे, दोनों पक्षों के साक्ष्य देख लेने के बाद, आपसी सहमति के समझौते पर समाप्त होते हैं।
बच्चों की अभिरक्षा
माता-पिता के बीच अभिरक्षा का फ़ैसला संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 और हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के तहत होता है, या तलाक के मुकदमे के भीतर ही एचएमए की धारा 26 के तहत परिवार न्यायालय करता है। एक सिद्धांत बाकी सब पर भारी है: बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है। सर्वोच्च न्यायालय ने Gaurav Nagpal v. Sumedha Nagpal (2009) में कहा कि बच्चे कोई चल संपत्ति नहीं हैं।
- 5 साल से छोटे बच्चे सामान्यतः माँ के पास रखे जाते हैं (हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम की धारा 6(a)), जब तक कि इससे बच्चे को नुकसान न हो।
- बड़े बच्चों से न्यायाधीश अक्सर अपने कक्ष में बात करते हैं, और उम्र बढ़ने के साथ उनकी पसंद का महत्व बढ़ता जाता है।
- अदालत यह देखती है कि रोज़मर्रा में बच्चे की देखभाल कौन करता आया है, पढ़ाई और स्थिरता कैसी है, हर माता-पिता का घर और काम के घंटे कैसे हैं, और क्या कोई पक्ष बच्चे को दूसरे के खिलाफ़ भड़का रहा है।
- जिस पक्ष को अभिरक्षा नहीं मिलती, उसे लगभग हमेशा मुलाक़ात का अधिकार मिलता है, जैसे सप्ताहांत, छुट्टियों का कुछ हिस्सा, त्योहार और वीडियो कॉल। अंतरिम मुलाक़ात मुकदमे की शुरुआत में ही तय कराई जा सकती है।
अभिरक्षा विवाद के दौरान दूसरे पक्ष की सहमति के बिना बच्चे को विदेश ले जाने पर बच्चे का पासपोर्ट जमा कराने और बच्चे को वापस लाने के आदेश हो सकते हैं। यह चिंता अदालत के सामने जल्दी रखें, उड़ान के बाद नहीं।
मुकदमे के दौरान भरण-पोषण
जिस पक्ष की आय पर्याप्त नहीं है, वह तलाक लंबित रहने के दौरान एचएमए की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की माँग कर सकता है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 थी, अलग से भरण-पोषण याचिका दायर करना भी आम है। Rajnesh v. Neha (2020) के निर्देशानुसार दोनों पक्षों को संपत्ति और देनदारी का शपथ पत्र दाखिल करना होता है।
साथ लाने के कागज़ात
- विवाह प्रमाणपत्र, शादी का कार्ड और फ़ोटो।
- दोनों पक्षों के पहचान पत्र और वर्तमान पते।
- बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल के रिकॉर्ड।
- दोनों पक्षों की आय का प्रमाण, यदि पता हो।
- किसी भी पक्ष द्वारा पहले से दायर किसी मुकदमे की प्रतियाँ।
लोग अक्सर पूछते हैं
गाज़ियाबाद में आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?
पहले और दूसरे प्रस्ताव के बीच कम से कम 6 महीने, जब तक परिवार न्यायालय उस अवधि में छूट न दे। पूरा समझौता हो और छूट मिल जाए तो मामला पहले भी समाप्त हो सकता है, लेकिन छूट देनी है या नहीं, यह अदालत का फ़ैसला है।
क्या हम दोनों को अदालत आना होगा?
हाँ, पहले और दूसरे प्रस्ताव पर बयान के लिए। विदेश में रहने वाला पति या पत्नी कभी-कभी अदालत की अनुमति से वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए, या कुछ चरणों के लिए विधिवत निष्पादित मुख्तारनामे के माध्यम से हाज़िर हो सकता है, लेकिन सहमति का व्यक्तिगत बयान ज़रूरी है।
हमारी शादी दिल्ली में हुई थी पर हम गाज़ियाबाद में रहते हैं। मुकदमा कहाँ दायर करें?
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 के तहत आप वहाँ दायर कर सकते हैं जहाँ विवाह हुआ, जहाँ दूसरा पक्ष रहता है, जहाँ आप अंतिम बार साथ रहे, या जहाँ पत्नी रहती है यदि वही दायर कर रही है। इसलिए गाज़ियाबाद आमतौर पर उपलब्ध रहता है।
बच्चों की अभिरक्षा किसे मिलती है?
अदालत बच्चे के कल्याण के आधार पर तय करती है। 5 साल से छोटे बच्चे सामान्यतः माँ के पास रखे जाते हैं। बड़े बच्चों के मामले में अदालत देखती है कि देखभाल कौन करता आया है, पढ़ाई और स्थिरता कैसी है, और अक्सर बच्चे से बात भी करती है। दूसरे पक्ष को आमतौर पर मुलाक़ात का अधिकार मिलता है।
क्या अदालत इस आधार पर तलाक दे सकती है कि विवाह असाध्य रूप से टूट चुका है?
परिवार न्यायालय नहीं। असाध्य रूप से टूटना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत कोई आधार नहीं है। केवल सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 142 के तहत इस आधार पर विवाह भंग कर सकता है।
समझौता होने पर 498A और भरण-पोषण के मुकदमों का क्या होता है?
अच्छा समझौता इन सभी को समेटता है: भरण-पोषण और घरेलू हिंसा के मुकदमे वापस लिए जाते हैं, और 498A की एफआईआर संयुक्त याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय से रद्द कराई जाती है, जिसका समय गुज़ारा भत्ते के भुगतान के साथ जोड़ा जाता है।
यह कानून की सामान्य जानकारी है, आपके मामले की सलाह नहीं। तथ्य बदलने से नतीजे बदल जाते हैं, इसलिए अपने मामले के बारे में किसी अधिवक्ता से बात करें।